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कुछ समय पहले एक सांसद अमेरिका गए थे

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कुछ समय पहले एक सांसद ने किस्सा सुनाया। वे सपरिवार अमेरिका गए थे। वहां उनकी पत्नी का पैर फिसल गया और उनके पैर की हड्डी टूट गई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां दूसरी दुर्घटनाओं के शिकार लोग भी आ रहे थे। उन्होंने डाक्टर को अपना परिचय दिया। एक नर्स आयी व उनकी पत्नी का परीक्षण करके चली गई। उसने उन्हें एक गोली खाने को दे दी। जब आधे घंटे तक कोई नहीं आया तो वे नाराज होकर पूछताछ करने लगे। उन्हें प्रभारी डाक्टर ने बताया कि आपकी पत्नी की टांग टूटने की जानकारी मिल चुकी है। उसे दर्द निवारक दवा दे दी गई है। हमारे लिए रोगी की प्राथमिकता उसकी हैसियत से नहीं बल्कि उसकी शारीरिक स्थिति के आधार पर तय की जाती है। हम पहले उन लोगों को देखते हैं जिनकी हालत ज्यादा खराब है। आपकी पत्नी को तकलीफ हो रही होगी पर उनकी जान को किसी तरह का खतरा नहीं है। आप इंतजार करें। उनका भी इलाज किया जाएगा। यह सुनकर वे मन मसोस कर लौट आए कि इससे अच्छा तो हमारा हिंदुस्तान है जहां जुखाम से पीड़ित वीवीआईपी को देखने के लिए डाक्टर दिल के दौरे के शिकार आम आदमी की भी परवाह नहीं करते।
हमारे देश में तो वैसे भी अगर जिंदा वीआईपी लाख का तो वह मरने के बाद करोड़ का हो जाता है। जिस महानगर दिल्ली में आम मुसलमान या इसाई को दफनाने के लिए दो गज जमीन तक मुहैया नहीं हो पा रही है वहीं चंद वीवीआईपी के लिए कई एकड़ में समाधियां बनाई गईं। बड़ी मुश्किल से 2001 में राजग सरकार जागी कि भविष्य में अब किसी भी वीवीआईपी जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रति, प्रधानमंत्री आदि की समाधि नहीं बनाने का फैसला किया। तत्कालीन सरकार ने उनका अंतिम संस्कार करने के लिए स्थायी स्थल बनाने का फैसला किया जिसे 12 साल बीतने के बाद यूपीए-2 की सरकार ने लागू किया है।
वैसे समाधि बनाने की बात अपने गले नहीं उतरी है। हिंदू धर्म में तो मृतक को जला कर उसकी राख तक नदियों में प्रवाहित कर दी जाती है क्योंकि हम पुर्नजन्म में आस्था रखने वाले लोग किसी व्यक्ति के दुनिया से चले जाने के बाद उसके शरीर के साथ किसी तरह का मोह नहीं करते हैं। व्यक्ति की आत्मा मरते ही शरीर छोड़ जाती है। कोई यह नहीं पूछता कि गुप्ताजी का या शर्माजी का संस्कार कब होगा, लोग पूछते हैं कि बॉडी कब शमशान पहुंचेगी। वहां मृतक के नाम पर जमीनों को घेरना सही नहीं लगता है। यहां दिवंगत कांशीराम का यह बयान याद आ जाता है जो उन्होंने इस समाधि स्थलों को लेकर दिया था। उन्होंने कहा था कि जिस दिल्ली शहर में जिंदा आदमी को अपने सोने के लिए जगह नहीं मिल पा रही है वहीं मुर्दें कई एकड़ में सो रहे हैं। अगर कभी मेरी सरकार बनी तो मैं इन समाधि स्थलों पर झुग्गियां डलवा दूंगा। इनके रखरखाव पर जो पैसा खर्च होता है वह अलग।
वैसे इसे विडंबना कहा जाएगा कि जहां एक आम दिहाड़ी मजदूर की मौत हो जाने पर उसके अंतिम संस्कार का सारा खर्च उसके परिवार को ही उठाना पड़ता है वहीं वीवीआईपी के मरने पर सारा खर्च गरीब करदाता ही उठाता है। गृह मंत्रालय में इस तरह के आयोजन की जिम्मेदारी संभालने वाले एक आला अफसर ने बताया कि कुछ साल पहले जब एक पूर्व उपप्रधानमंत्री की मृत्यु हुई तो हमने उनके परिवार से पूछा कि क्या वे भी अपनी तरफ से अंतिम संस्कार में कुछ करना चाहेंगे तो उन्होंने सीधे मना कर दिया। उनका कहना था कि यह तो राष्ट्रीय मामला है इसलिए इसका खर्च भी राष्ट्र को उठाना चाहिए। हिदायत देते हुए उन्होने यह जरुर बता दिया कि चंदन की लकड़ी व फलां ब्रांड का 16 किलो देसी घी जरुर डाला जाए।
उन्होंने कहा कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी यही कोशिश करता है कि वह अपने प्रियजन के अंतिम संस्कार का खर्च खुद उठाए पर हमारे वीवीआईपी का क्या कहना। उनका बस चले तो तेरहवीं पर पंडित को दिए जाने वाले दान के कपड़े और दक्षिणा तक सरकार से दिलवा दें। हालांकि इस देश में कुछ अपवाद भी है जैसे कि सरबजीत। इन्हीं राजनीतिज्ञों के चलते वे समाज में अलग हैसियत हासिल कर लेते हैं। शराब की तस्करी करते हुए पकड़े जाने पर पाकिस्तान की जेल में मारे जाने पर उन्हें शहीद का दर्जा दिया जाता है व उसी तरह से राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाता है। इस दृष्टि से एक सरबजीत को कितने सीआरपीएफ के शहीदों के बराबर माना जाए ? – लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और “विनम्र” उनका लेखन नाम हैं।

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